ढूह वाली लछमिनिया विस्थापित होते समय का दस्तावेज
रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास ‘ढूह वाली लछमिनिया’
अमरनाथ अजेय
यह दौर कठिन समय का है। इस समय में चुनौतियां चारो तरफ से हैं, कुछ खतरे बाहर से हैं तो कुछ भीतर से। जहां तक खतरों की बात है खासतौर से ये सोनभद्र जैसे आदिवासी बहुल जनपद में अन्य जनपदों की तुलना में कुछ ज्यादा ही हैं। लेकिन जो खतरे अपने लोगों से हैं वे कहीं अधिक त्रासद हैं, चिंतनीय है। आज के बाज़ारवादी समय का दबाव जंगल व जंगल भूमि पर ज्यादा है, और ये दबाव बनाने वाले कोई और लोग नहीं हैं, बल्कि अपने हुक्मरान हैं, अपने अफसर हैं, अपने कानून हैं। जो जंगली मानुष अपनी जमीन और जंगल से विस्थापित हो रहा है उसके लिए खतरा केवल जमीन का ही नहीं है बल्कि संस्कृति और सम्मान का भी है, अस्तित्व बचाने का भी है। ऐसे दुरूह समय का दस्तावेज है रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘ढूह वाली लछमिनिया’। लछमिनिया समामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक खतरों से घिरे हुए एक आदिवासी परिवार की युवा लड़की है। लछमिनिया की चिंता में केवल अपनी देह ही नहीं है उसकी चिंताओं में भीखू काका की जमीन है, तो वह पीड़ित लडकी भी है जो जिला स्तर के एक अफसर द्वारा यौनशोषण की शिकार हुई है, तथा उसका गॉव भी है जिसे किसी न किसी दिन विस्थापित किया जाना है। गॉव को विस्थापित किए जाने की नोटिस सरकार ने कथितरूप से तामिल करा दिया है। इन चिंताओं व चुनौतियों के अलावा उसकी चिंताओं में गॉव की फसल है, गीत, संगीत तथा परंपराएं है ‘करमा’ नृत्य, संगीत मण्डली की सहभागिता को टूटने से बचाना भी है। इन चिंताओं की खातिर वह माथा पीट कर टूट जाने वाली किसी लड़की की तरह नहीं है बल्कि किसी बहादुर की तरह वह हर स्तर पर चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार भी है। चुनातियों से टकराने की उसकी मानसिक तैयारी कुदरती है, इस तैयारी के लिए उसने कहीं से शिक्षण प्रशिक्षण नहीं लिया है। वह अब तक तमाम चरित्रों से अलग है जो स्वस्फूर्त चेतना का उत्पाद है। उसे पता है कि चुनौतियों से टकराने के लिए उसे क्या करना चाहिए। बाहर तथा भीतर से आए संक्रमणों से जिस तरह वह लड़ती है वह स्वतः उल्लेखनीय बन जाता है। संक्रमण की स्थितियां, परिस्थितियां कुदरती नहीं, बदलते समय के जड़ लोगों की कुटिल चालों, विभेदी कानूनी फन्दों, लुभावने वादों के जरिए आती हैं। समय तो बदला है लेकिन उसके साथ खतरे भी बदल गये हैं। खतरों नेे अपना रूप जिले के पीड़ित लड़की का यौन शोषण करने वाले अधिकारी (उपन्यास का एक पात्र) की तरह बदल लिया है। यह वही अधिकारी है जो एक दिन लछमिनिया को दबोच लेता है, उसे क्या पता कि लछमिनिया जो एक आदिवासी युवती है वह समय से टकराने के कौशल में माहिर है, वह अपना बचाव विषम स्थितियों में भी कर सकती है। ऐसा ही हुआ..अपने बचाव में लछमिनिया हसुआ वाली लड़की बन जाती है। खतरों के बारे में किसे पता कि वे अफसर की कुटिल चालों के रूप में आयेंगे, या किस प्रकार आयेंगे? खतरा आ गया अफसर के रूप में...अफसर को तो करमा मंडली का चुनाव करना था। सो उक्त अधिकारी लछमिनिया के गॉव गया हुआ था, करमा नाचने व गानेवाले तो आदिवासियों के गॉव में ही मिलते। गॉव में करमा नृत्य का प्रदर्शन हुआ, नृत्य के प्रदर्शन ने अफसर की निगाह में लछमिनिया के रूप को कामुक बना दिया फिर क्या था, अफसर तो अफसर कृत्रिम बहानों के जरिए वह टूट पड़ा लछमिनिया पर और लछमिनिया ने बचाव में हसुआ उठा लिया। इसके पहले कि लछमिनिया अफसर पर हसुआ चला देती, अफसर अपने वर्गीय चरित्र के अनुरूप गिड़गिड़ाने लगा। लछमिनिया ने कुदरती उदारता के कारण अफसर को जीवित छोड़ दिया, उस पर हसुआ नहीं चलाया। अफसर के गिड़गिड़ाने व माफी मांगने को उसने कुदरती समझा, ‘गलतियां हो जाती हैं किसी की जान लेना ठीक नहीं।’ खतरों का क्या, दिन हो रात हो, जगह कोई हो, दहाड़ते हुए आ जाते हैं। वह भी ऐसे समय मंे जब दुनिया पूंजी के नाच में मगन हो, जहां कदम कदम पर आशंकायें व खतरे ही हों। खतरे तो ऐसे हैं जो गॉव के बड़े जोतदार तथा थाने के दुलरुआ शंकर गवहां की तरफ से भी लछमिनिया के सामने आये। वह उन खतरों से तो लड़ ही रही थी कि एक दिन पूंजीवादी चरित्र का एक और खतरा उसके बपई की तरफ से आ गया जिसमें वह बुरी तरह से उलझ गई... अब क्या होगा? कैसे लड़ेगी वह बपई से? बपई ने तो एक ठीकेदार से उसे बेचने का राजीनामा कर लिया है। जैसे वह कोई सामान हो, धान, चावल, गेहूं, गाय गोरू की तरह। वह बिक जायेगी पर उसके बपई को नहीं मालूम कि लछमिनिया बिकने वाली सामान नहीं, वह कोई कमोडिटी नहीं है, जिसे बेच दिया जाये। वह उस खतरे से भी लड़ती है और सफल होती है। ठीकेदार की कार दिन दहाड़े जला दी जाती है, लछमिनिया का बपई भी उस दिन गॉव में होता तो मारा जाता, गॉव की स्वस्फूर्त उत्तेजना में उसकी जान चली जाती, ठीकेदार जान बचाकर भागा नहीं तो जाने क्या होता, ठीकेदार की अकूत संपदा उसे जीवन दान तो नहीं दे सकती थी। सो अगर वह गॉव से भागा न होता तो मारा जाता। लछमिनिया को क्या पता कि उसका बपई भी उसके लिए खतरा बन जायेगा और उसका सौदा ठीकेदार से कर लेगा। लछमिनिया का बपई हालांकि था तो आदिवासी ही जो सामान्यतया बाजारू नहीं हुआ करते वह ठीकेदार के प्रलोभन में बाजारू बन गया और अपनी बिटिया का ही बेचने के लिए राजीनामा कर लिया। उसे ठीकेदार ने सपना दिखाया था कि उसे वह अपने क्रशर का पार्टनर बना देगा जहां वह मजूरी करता था। पार्टनर बन जाने की लालच ने लछमिनिया के बपई को बाजरू बना दिया और उसने अपनी बिटिया को बेच देने का राजीनामा ठेकेदार से कर लिया। तो खतरे ऐसे होते हैं, खतरे मॉ, बाप, भाई, बहन, बहनोई, मामा किसी के भी जरिए आ सकते हैं। बपई की तरफ का खतरा लछमिनिया के लिए पूंजी के खेल वाला था, कौन है जो धन दौलत वाला नहीं बनना चाहता। पर लछमिनिया तो स्थितिप्रज्ञ होकर बपई की कुटिल योजना से टकरा जाती है। ठीकेदार भाग जाता है, उसकी कार जला दी जाती है। लछमिनिया के गॉव के लिए ही नहीं थाने के लिए भी यह घटना करवट बदल लेती है। थानेदार व ठीकेदार आदि तो वैसे भी पूंजीतंत्र के रिश्तों में बंधे होते हैं। स्थानीय थाने का दारोगा जो पदेन अर्थपिपाशु था उसे ठीकेदार की पूंजी ने मोह लिया फिर तो दारोगा ने ठीकेदार की कार जलाने और गॉव में झगड़ा फसाद करने के जुर्म में गॉव के कुछ अन्य युवाओं के साथ लछमिमिया के पति को गिरफ्तार कर लिया। लछमिनिया जानती थी कि दारोगा कि यही सीमा है, उसके पति को गिरफ्तर करने के अलावा वह कर भी क्या सकता है पर दारोगा को नहीं पता कि लछमिनिया का गॉव का जन मन क्या कर सकता है? लछमिनिया व उसके पति को को पूरा गॉव भली भांति जानता है। गॉव के लड़के उन दोनों के लिए मरमिटने के लिए तैयार रहते हैं। लड़कों को बुरा लगा कि लछमिनिया के बपई ने लछमिनिया को बेचने का ठीकेदार से राजीनामा कर लिया है सो गॉव के नौजवान लड़कों ने गुस्से में आकर स्वस्फूर्त ढंग से ठीकेदार की कार जला दिया और उसी दिन थाना भी घेर लिया। उन्हें नहीं पता था कि थाना घेरना अन्याय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है या और कुछ। दारोगा थाना घिरा देख कर सहम गया उसके पास घेराव का दमन करने के तरीके नहीं थे, वह मजबूर था, अदालत ने लछमिनिया के पति की गिरफ्तारी के बारे में थाने से रिपोर्ट भी मॉग लिया था। लक्षमिनिया के पति की मॉ से जंगल विभाग के रेंजर की करीबी पहचान थी। रेंजर कानूनी दॉव पेंचों के अनुसार लछमिनिया के पति को गिरफ्तार होते ही अदालत चला गया था। अदालत ने थाने से रिपोर्ट मॉग लिया था। गॉव से गवाह भी नहीं मिलते। सो थानेदार ने लछमिनिया के पति को थाने से ही छोड़ दिया, कौन बवाल में पड़े, अदालत किसी को नहीं छोड़ती। तो यही कहानी है ‘ढूह वाली लछमिनिया’ उपन्यास की। इस कहानी में लछमिनियिा की जिन्दगी से जुड़ी चुनौतियां है तो गॉव जवार से जुड़ी चुनौतियां भी हैं। लछमिनिया जंगली गॉव की रहने वाली है जंगल के गॉव यानि कई बार के विस्थापन के शिकार गॉव। लछमिनिया का गॉव भी कई बार के विस्थापन के बाद बसा है पर उसे हाल ही में उजाड़ा जाना है, नोटिसें दी जा चुकी हैं। उपन्यास इसी आखिरी बार के विस्थापन के लिए दी जा चुकी नोटिस एवं विस्थापन कार्यवाहियों के विरोध के स्तर पर समाप्त हो जाता है। होता यह है कि जिस कंपनी को लछमिनिया के गॉव की जमीन सरकार द्वारा आवंटित किया गया है उक्त कंपनी आवंटित जमीन पर कब्जा लेना चाहती है दूसरी तरफ गॉव वाले हैं कि वे किसी भी हाल में उजड़ना नहीं चाहते सो वे प्रतिकार में उठ खड़े होते हैं। जैसा कि मालूम है कि सरकार और प्रशासन तो एक रेखीय दमनात्मक सत्ता प्रबंधन पर पुलिस बल के सहयोग से चलने का अभ्यासी हुआ करती है सो वहां पुलिस बल दमन पर उतर जाता है... फिर वही हजारों साल की पुलिस परंपरा, मारपीट, यातना, दमन और गिरफ्तारियां.... गॉव के नौजवानों के साथ गॉव की कुदरती नेत्री लक्षमिनिया को गिरफ्तार कर लिया जाता है, वह पाथरटोला वालों के साथ जेल चली जाती है.... वह निश्चिंत है..... ‘का फरक है जेहल अउर ईहां में? ईहां से तो जेलवय ठीक है, न मार का डर, न चोरी चमारी का डर, खाओ अउर सूतो’ लछमिनिया पाथर टोला गॉव के सर्वतोमुखी विकास के लिए एक नायिका की भूमिका निभाती है जो भीखू काका की जमीन में बोई धान की फसल को दबंग शंकर गवहां व उनके पुत्रों को ले जाने से रोकवा देती है। गॉव में होने वाली अर्थहीन रैलियों का प्रतिरोध करती है और प्रतिशोध में फसाये गये अपने प्रेमी/पति को थाने का घेराव करके छुड़वा लेती है। इतना ही नहीं वह खुद को भी अपने बाप के साजिशों से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं वह अपने गॉव के विस्थापन के प्रतिरोध में गॉव वालों के साथ जेल जाती है। उपन्यास में आये शब्द चित्रों को देखें... ‘चरित्र लड़कियों को जानता है, यदि मजबूरी न हो तो वे किसी को भी सभ्य बनाकर ऐसा संस्कारित कर दें कि वे जीवन भर नाम न लें कि लड़कियां ऐसी होती हैं जिनकी देह पर बाजार का अर्थ लिखा जा सकता है’ आखिर बाजार ने किसे नहीं छला है? अपसंस्कृति भी तो बाजार का ही एक खेल है। आज के जटिल समय में जंगल का आदिवासी विकास की धारा से कोसों दूर है। उनमें जनतांत्रिक प्रतिरोध की क्षमता का भी विकास नहीं हो पाया है। सोनभद्र जिले के आदिवासियों के विस्थापन पर केन्द्रित प्रस्तुत उपन्यास ‘ढूहवाली लछमिनिया’ गिरिवासियों के दुख दर्द का कालजयी दस्तावेज हैै। अपनी भाषा में उपन्यास के पात्र अपनी स्थितियों, परिस्थितियों का एहसास कराते हैं जिससे संवाद जीवंत हो जाता है। उपन्यास की भाषिक जीवंतता उल्लेखनीय है। अपेक्षा है कि प्रस्तुत उपन्यास पाठकांे का घ्यान आकर्षित करने में सफल होगा। अन्त में उपन्यास में आये कुछ संवादों, प्रतिसंवादों का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। ‘पर शंकर यादव अपने घर लौटने के बाद अपने में डूब गया.. ज़माना बदल गया है, जंगल जाग रहा है पहले वाला नहीं कि सोया हुआ था। सरकारें भी अब पहले वाली नहीं हैं, गरीब गुरबों की सरकार प्रदेश में काबिज है, गरीबों की सुरक्षा के बाबत कानून बन गये हैं। थाना हो या कचहरी अब कहीं भी गॉधी टोपी वाले नहीं दिखते, ठाकुर, बाभन जैसे ज़मीनदार अपनी गुफाओं में बैठे हैं, करंे भी तो क्या?’ पृ...20 ‘चुप रह छोटकू, तूं बड़बड़ करता रहता है, तूं का जानेगा कायदा, कानून, अब तो पुलिस पेड़ों अउर झाड़ियों पर भी मुकदमा कर देती है’ पृ..21 ‘समझेगा का? यही कि चिड़िया जाल में, जाल खींचो अउर पकड़ लो’ पृ..38 ‘का खाली, का भरा, खाली ही ठीक है, पहिले मॉग भरो फिर पेट, आया था एक लंगूर’ पृ...47 ‘देख महटर, हम तोहरे पर इलजाम नाहीं लगा रहे, खाली हम अपने को बचाय रहे हैं,नाहीं बचायेंगे तो...मन तो भर जायेगा जो खाली खाली है, पर मनवै तो नाहीं भरेगा नऽ, पेटवो तऽ भर जायेगा’ पृ...51 ‘लछमिनिया ऐसी नदी नहीं जिसे बांधा जा सके या पुल ही बनाया जा सके’ पृ...57 ‘गॉव में जबसे चिमनियां घुसी हैं, न जाने कितने किसिम के धुंआ भी घुसे हैं’ पृ..61 ‘नींद में केवल नींद ही नहीं थी, उसमें पीड़ित लड़की थी, उसकी बेबस छटपटाहट थी,खूनी पंजे थे। लड़की छटपटा तथा चीख रही थी, चीखें निकलतीं जो कमरे की दीवारों, छाजन से टकराकर बिस्तरे पर भहरा जातीं, फिर पसीना पसीना हो जातीं। खूनी पंजे किसी उत्सव में डूबे हुए देह का मनोरम चूमते चाटते। पृ...76 ‘संघरस तो मरदों का काम है, एमें जनाना का करेंगी? पृ...81 ‘वैसे गॉवों में कागजों की पहुंच बहुत कम होती है, और कानून तो कागजों पर ही उछलता कूदता है।’ पृ...87 ‘टोले मं जनतंत्र की आग धधक रही थी’ पृ..90 ‘उस दौर के अधिकारी भी खूब थे, कानून की सजी संवरी जीभ वाले, पुलिस के पास तो बारूदी जुबान थी ही।’ पृ..92 ‘बाल, बुतरू भी नौकरों से जनमवाते हैं का अइया?’ पृ..93 ‘इस सभ्यता ने तो यही सिखाया है कि हर चीज बेचे जाने योग्य है।’ पृ..101 ‘अरे! मरदवा तऽ सभै हरामी होते हैं।’ पृ...127 ‘लछमिनिया तूं घूंघट काढ़कर घर में बैठी है, निकल बाहर, हल्ला कर, चिल्ला जोर जोर से, कोई तो सुनेगा, कोई तो चलेगा तेरे साथ’ पृ...136 ‘भगाई को राजीनामा बोलता है, एके कानून बचायेगा, जा कानून के संगे खा, पी, अउर हग, मूत। रहेगा कहां रे! पृ...139 समीक्ष्य कृति... ढूह वाली लछमिनिया रचनाकार.. रामनाथ शिवेन्द्र पाठ...जुलाई...2017
प्रकाशक---
ज्योति पर्व प्रकाशन
९९,गरमाने खण्ड-३,इन्दिरापुरम, गाजियाबाद-२०१०१२
९८११७२११४७
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