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जंगल दंश वाम अतिवाद और अहिंसा पर एक बहस,

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‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना,   अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’ जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है? वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान हो...

सहपुरवा आपातकाल के दौरान भूमि आवंटन मैं धांधली ए तथा पुलिस उत्पीड़न की गाथा

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           सहपुरवा के अंश  सहपुरवा 1978 में विन्ध्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. यह उपन्यास आपातकाल कर क्रूरताओं के विवरणों पर केन्द्रित है.. सामान्य सी एक दलित महिला कैसे अपनी तथा गांव की सुरक्षा के लिए संघर्ष करती है और व्यवस्था से टकराती है... इसका पुनर्प्रकाशन ई बुक के रूप में  देश की मानी जानी साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा ने किया है...  यहां प्रस्तुत है सहपुरवा के अंश...... ‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’ ‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’ फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी... ‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा. ‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’ फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ... ‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भ...

अन्तर्गाथा बदलते मानकों का आइना

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बदलते मानकों का आइना     रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास  ‘अन्तर्गाथा’  अमरनाथ अजेय  सृष्टि में जैसे जैसे बदलाव हो रहे हैं वैसे ही मानव सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक संरचना में भी दिनों दिन बदलाव होते दिख रहे हैं। मानव मूल्य व मान्यताएं तथा सिद्धान्त जो मानव निर्मित क्रियाकलाप हैं, वे भी सुविधाओं की परिधि में अपनी जमीन छोड़ कर भिन्न भिन्न आडबरों में रूपान्ताित होते जा रहे हैं। श्री रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘अन्तर्गाथा’ कुछ इन्हीं विसंगतियों पर प्रहार करता हुआ कथा का आकार लेता है। आदमी, आदमी न होकर मात्र अपनी परर्छाइं हो गया है। प्रस्तुत उपन्यास में कथाकार, कवि, ठेकेदार, नेता जैसे कई चरित्रों का पोस्टमार्टम किया गया है। विमर्श की दृष्टि से स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, और बहुत से अन्य सभ्यतागत विमर्शों के साथ साथ मानव जीवन में घटित होने वाले बिडम्बनाओं का विश्लेषण किया गया है, जो कथित सभ्य समाज से अन्तर्गुम्भित हैं। कथा प्रारंभ होती है प्रवासीनाथ जी से जो एक चर्चित उपन्यासकार एवं विश्वविद्यालय के प्रवक्ता है ंतथा सुशीला और अमरेन्दर से, जो उनके निर्देशन में शोध कार्य...

दूसरी आज़ादी कितनी लड़ाइयां कितनी बार

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कितनी लड़ाइयां कितनी बार  ‘रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास  'दूसरी आज़ादी’  सुरेश पंडित  ‘इतिहास तो हर पीढ़ी लिखेगी/बार बार पेश होंगे/मर चुके/जीवितों की अदालत में/बार बार उठाए जायेंगे/कब्रों में कंकाल/हार पहनाने के लिए/ कभी फूलों के/कभी कांटों के/समय की कोई अंतिम अदालत नहीं/और इतिहास आखिरी बार नहीं लिखा जाता।’ पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविता का यह हिन्दी अनुवाद इतिहास के बारे में फैलाए गये बहुत से मिथकों का खंडन करता है। कोई भी इतिहास समग्रतः सच्चा नहीं होता। इसलिए वह बार बार लिखा जाता है। बार बार गड़े मुर्दे उखाड़ जाते हैं और उनकी कारनामों पर समय की अदालत में फैसले लिए जाते हैं। रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘दूसरी आज़ादी’ भी इस सच को पकड़ने की एक बेचैन कोशिश है। शीर्षक से जाहिर होता है कि इसमें उस पहली आज़ादी के बाद का इतिहास है, जिसे पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में काफी संघर्षो और कुर्बानियों के बाद हासिल किया गया था। उसके बाद आज तक सŸाा के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आगे भी लड़ी जाती रहेंगीं क्योंकि सŸाा चाहे सामंतशाही की हो या लोकतांत्रिक उसका चरित्र प्रायः एक सा होता है। इस...

तीसरा रास्तामौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी

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मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास  तीसरा रास्ता    नन्द किशोर नीलम  एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो.आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ ;बाउन्ड्री का काम खेत की रखवाली करना होता है पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन,जी,ओ, ओ की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास तीसरा रास्ता यही संशय उमड़ता.घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन,जी,ओ, का कर्ताधर्ता डी.बी़. जैसा शातिर व्यक्ति जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है वह कहता है क्रान्ति ए...

कन्फेशन अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता

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अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता  रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास  ‘कनफेशन’    अमरनाथ ‘अजेय’  संबंधों के बीच न जाने कितने सवाल हैं, जो अब तक सुलझाए नहीं जा सके हैं, जिनसे टकराते हुए व्यक्ति की आत्मा चटक-चटक कर विदीर्ण हो रही है जिसके लिए कोई मरहम कारगर नहीं दीखता। संबंध चटकने की टकराहटें इतनी तेज होती हैं कि उसकी आवाजें संवेदनशील साहित्यकार के लिए सर्जना का विषय-वस्तु बन जाती हैं। कविता, कहानी, लेख, संस्मरण और उपन्यास की शक्ल मंे ढलकर देश, काल व समाज के लिए अमूल्य कृति बन जाती हैं। सामाजिक संरचना में भूमि, संपत्ति तथा नारी अस्मिता के सवाल प्रमुख रूप से मानवीय संबधों को चालित करतेे हैं। यह सच है कि नर, नारी के संबंधों की सुकुमार प्रवृत्ति यॉ ही मानव सभ्यता को गतिशील करते हुए ऊॅचाई तक ले जाती हैं। चर्चित लेखक रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ नर, नारी के मानवीय संबंधों की विसंगतियों के धरातल पर बुना गया उनका नया उपन्यास है। नारी को उपभोग की वस्तु मान कर उसके साथ बनाए जाने वाले संबंधों की परिणति ‘एड्स’ जैसे रोग तक जा पहुॅचती है। यह कितना भयानक होता है इसका अनुमान किसे ...

पट्टा चरित भूमि आवंटन के संघर्ष की औपन्यासिक गाथा

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पट्टा चरित(रामनाथ शिवेंद्र) भूमि आवंटन के संघर्ष की औपन्यासिक गाथा  पट्टा चरित उपन्यास के बारे में कुछ कहना, न कहना दोनों बराबर है। उपन्यास खुद आपसे संवाद करेगा, संवाद ही नहीं प्रतिवाद भी करेगा तथा अपने सृजन के बारे में बाजिब बयान भी देगा तथा बताएगा कि मौजूदा शदी में भी इस उपन्यास की जरूरत क्या है? वैसे यह बता देना लेखकीय औचित्य है कि इसकी कथा आठवें दशक में ही उपन्यास का रूप धर कर ‘सहपुरवा’ उपन्यास के नाम से मेरे मित्रों के सहयोग से प्रकाशित हो चुकी थी। वह मेरा पहला औपन्यासिक प्रयास था। इसमें पात्रों के संवाद की भाषा हिन्दी तथा भोजपुरी बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर वाली नहीं थी बल्कि ठेठ बनारसी या बिजयगढ़िया थी। संवाद के अलावा सारा कुछ खड़ी बोली में था। तो कथा पुरानी है आपात काल के आस पास की। सवाल है कि पुरानी कथा को फिर से क्यों? आठवें दशक से लेकर अब तक के गॉवों की जॉच पड़ताल कर लीजिए और एक झटके से आपात काल को फलांग कर इक्कीसवीं शताब्दी में घुस आइए फिर देखिए कि क्या गॉव बदल गये? गॉवों की संस्कृति बदल गई? और गॉव ऐसे हो गये कि बिना संकोच ‘अहा ग्राम्य’ कहा जा सके, हॉ गॉवों से पोखर गायब ...