जंगल दंश वाम अतिवाद और अहिंसा पर एक बहस,
‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना, अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’ जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है? वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान हो...